!! पहला सुख निरोगी काया !!
*डॉक्टर्स से कैसे छुटकारा पाएँ....
आज की भाग दौड़ की जिंदगी में मनुष्य अपनी वास्तविक संपत्ति जिसके अभाव में सम्पूर्ण जीवन ही नष्ट या फिर अभावों से ग्रसित हो सकता है अर्थात हमारे जोवन की अमूल्य निधि इस मानव शरीर की अस्वस्थता के चलते इस संसार के सभी सुख गौण लगने लगते है उसी की ओर विकर्षित होता चला जा रहा है।
अर्थात पैसे व नाम के पीछे, भौतिक सुख सुविधाओं की कल्पना के साथ इस प्रकार बहता चला जा रहा है कि वह जीवन के वास्तविक लक्ष्य को भूलकर इस शरीर के विनास का स्वयं ही कारण बनता जा रहा है।
यदि समय के रहते मानव जाति ने अपने खान- पीन व दैनिक दिनचर्या में बदलाव नहीं किया तो उसे कुछ ही समय में मुँह की खानी पड़ेगी अर्थात अनायास ही न चाहते हुए भी विकास की जगह विनास की राह पकड़नी पड़ेगी।
इस संबंध में कवि कैलाश सुमा अपने विशेष अनुभवों व अध्ययन से प्राप्त ज्ञान के आधार पर बताना चाहते हैं कि "स्वस्थ रहने का मूल मंत्र- कुदरत से प्राप्त खाद्यान्न को अपने हिसाब से न ढालकर कुदरती रूप में ही खाने पर हम उसका वास्तविक गुण अपने शरीर को दे पाएँगे।"
अर्थात कहें तो प्रकृति से प्राप्त खाद्य सामग्री जिसको बिना तोड़े मरोड़े जितना कम बदलाव करके खाएँ तो वह उतना ही फायदे मंद है जितना कि उसके रूप को अधिक से अधिक बिगाड़ कर खाने पर नुकशान होता है।
जैसे:-
चने को हम सीधा पेड़ से खाते हैं तो वह हमारे शरीर को बहुत लाभ देता है,
उसी चने को भून कर खाते हैं तो कम पहले से कम लाभ देता है,
फिर उसे दाल बनाकर खाते हैं तो पहले से और कम लाभ देता है,
फिर उसे बेसन बनाकर पानी के हाथ की रोटी बनाकर खाते हैं तो पहले से कम लाभ देता है,
फिर उस बेसन में नए नए मशाले मिलाकर भूनकर खाते हैं तो वही चना नुकशान देना शुरू कर देता है,
और फिर उसी बेशन की पकोड़ी वगैहरा बनाकर तेल में तल कर खाते हैं तो वह बहुत ज्यादा नुकसान करता है यहाँ तक कि वही चना तुरन्त प्रभाव से पेट में खलबली मचा देता है और बीमारी की राह में लाकर खड़ा कर देता है।
अब इसका एक रूप देखिये कि चने को हम अंकुरित करके खाते हैं तो वह जिस हालात में था उससे एक गुण अधिक फायदा करेगा क्योंकि उसकी गुण धर्मिता एक कदम वापस प्रकृति की ओर लौट कर उसके करीब हो गई है इसीलिए।।
और हाँ इसीलिए तो फ़ल व मेवे अधिक फायदे मंद होते हैं क्योंकि हम उन्हें उसी रूप में ग्रहण करते हैं जिस रूप में हमें प्रकृति हमें भेंट करती है।
विश्वास है कि आप समझ गए होंगे कि कुदरत से प्राप्त खाद्य वस्तु का रूप जितना बिगड़ा होगा उतना ही वह अपना गुण खोते ही चली जाती है।
See compulsory it's best knowledge about health
ReplyDelete